पुराने कुएँ का रहस्य
गाँव के किनारे एक पुराना कुआँ था। उस कुएँ के बारे में कहा जाता था कि जो भी रात के समय उसके पास जाता है, वह कभी पहले जैसा वापस नहीं आता।
लोग इस बात को अंधविश्वास समझते थे, लेकिन गाँव के बुजुर्गों की आँखों में उस कुएँ का नाम सुनते ही जो डर दिखाई देता था, वह किसी कहानी से ज्यादा वास्तविक लगता था।
मैं, यानी अर्जुन, पेशे से एक पत्रकार था। मुझे रहस्यमयी और डरावनी घटनाओं की सच्चाई खोजने का शौक था। जब मैंने इस कुएँ के बारे में सुना, तो फैसला कर लिया कि इसकी सच्चाई दुनिया के सामने लाकर रहूँगा।
गाँव का नाम रामपुर था। मैं शाम के समय वहाँ पहुँचा।
गाँव में प्रवेश करते ही मुझे अजीब सा सन्नाटा महसूस हुआ। बच्चे खेल नहीं रहे थे, लोग जल्दी-जल्दी अपने घरों की ओर जा रहे थे और हर किसी के चेहरे पर एक अनजाना भय था।
मैंने एक बूढ़े व्यक्ति से पूछा,
“बाबा, इस पुराने कुएँ की कहानी क्या है?”
बूढ़ा व्यक्ति कुछ पल तक मुझे घूरता रहा।
फिर धीमी आवाज में बोला,
“बेटा, अगर जान प्यारी है तो उस कुएँ से दूर रहना।”
“लेकिन क्यों?”
“क्योंकि वहाँ कोई रहता है… जो इंसान नहीं है।”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
लेकिन एक पत्रकार होने के नाते मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई।
रात होने का इंतजार किए बिना मैं कुएँ की ओर चल पड़ा।
कुआँ गाँव से लगभग एक किलोमीटर दूर जंगल के बीच था।
जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ रहा था, मोबाइल का नेटवर्क गायब होने लगा।
चारों तरफ घना अंधेरा फैल चुका था।
आखिरकार मैं उस कुएँ तक पहुँच गया।
कुआँ बेहद पुराना था।
उसकी दीवारों पर काई जमी हुई थी और आसपास अजीब सी ठंडक महसूस हो रही थी।
गर्मी का मौसम होने के बावजूद वहाँ तापमान अचानक बहुत कम लग रहा था।
मैंने टॉर्च जलाकर कुएँ के अंदर झाँका।
अंदर केवल अंधेरा दिखाई दे रहा था।
अचानक…
कुएँ की गहराई से किसी महिला के रोने की आवाज सुनाई दी।
मेरे हाथ काँप गए।
मैंने सोचा शायद कोई जानवर होगा।
लेकिन तभी आवाज साफ सुनाई दी।
“मुझे बाहर निकालो…”
मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।
आवाज बिल्कुल इंसानी थी।
मैंने दोबारा नीचे देखा।
और उसी पल मेरी टॉर्च की रोशनी में कुछ ऐसा दिखाई दिया जिसने मेरी आत्मा तक को हिला दिया।
कुएँ के अंदर एक सफेद चेहरा दिखाई दिया।
उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
वह सीधे मेरी ओर देख रही थी।
मैं घबराकर पीछे हट गया।
लेकिन अगले ही सेकंड वह चेहरा गायब हो चुका था।
मैंने खुद को समझाया कि शायद यह मेरा भ्रम होगा।
तभी मेरे मोबाइल पर अचानक एक मैसेज आया।
नेटवर्क न होने के बावजूद।
मैसेज में केवल एक लाइन लिखी थी—
“आज रात तुम वापस नहीं जाओगे।”
मेरे हाथों से मोबाइल लगभग गिर गया।
मैंने नंबर देखने की कोशिश की।
लेकिन वहाँ कोई नंबर नहीं था।
सिर्फ एक खाली स्क्रीन दिखाई दे रही थी।
अब डर धीरे-धीरे मेरे दिमाग पर हावी होने लगा था।
तभी पीछे झाड़ियों में कुछ हिला।
मैंने टॉर्च घुमाई।
कोई नहीं था।
लेकिन कुछ सेकंड बाद फिर वही आवाज आई।
इस बार मेरे ठीक पीछे से।
“अर्जुन…”
मैं जम गया।
गाँव में मेरा नाम किसी को नहीं पता था।
फिर यह कौन था?
मैंने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।
और जो मैंने देखा…
उसे देखकर मेरी चीख निकल गई।
(जारी…) Part-2
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