हत्या की गुत्थी सुलझाना
शहर के बीचों-बीच एक पुरानी हवेली थी, जिसे लोग “शांतिनिकेतन” के नाम से जानते थे। यह हवेली एक समय में रौनक से भरी रहती थी, लेकिन अब यह वीरान और सुनसान हो चुकी थी। हवेली के मालिक, श्रीकांत वर्मा, एक प्रतिष्ठित व्यापारी थे, जो पिछले कई सालों से हवेली में अकेले रह रहे थे। एक दिन सुबह, पुलिस को खबर मिली कि श्रीकांत वर्मा का शव उनके कमरे में पड़ा मिला है। उनके सिर पर किसी भारी वस्तु से चोट की गई थी, और पूरे कमरे में खून फैला हुआ था।
पुलिस ने तुरंत जाँच शुरू की, और मामले की तह तक जाने के लिए शहर के सबसे मशहूर जासूस, विक्रम को बुलाया गया। विक्रम अपनी तीव्र बुद्धि और सूझबूझ के लिए जाना जाता था। वह हमेशा गुत्थियों को सुलझाने में माहिर था और इस हत्या की गुत्थी भी उसकी सबसे बड़ी चुनौती थी।
विक्रम जब घटनास्थल पर पहुँचा, तो उसने सबसे पहले उस कमरे का मुआयना किया जहाँ हत्या हुई थी। कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था, और खिड़कियाँ भी पूरी तरह से बंद थीं। ऐसा लग रहा था कि यह हत्या एक “बंद कमरे” की गुत्थी है, जिसे सुलझाना आसान नहीं होगा।
प्रथम दृष्टया जाँच
विक्रम ने कमरे को ध्यान से देखा। कमरे के कोने में एक टूटा हुआ फूलदान पड़ा था, और बिस्तर पर खून के धब्बे थे। पास ही एक कुर्सी उलटी पड़ी थी, जिससे लगता था कि हत्या के समय कुछ संघर्ष हुआ था। लेकिन एक चीज़ ने विक्रम का ध्यान खींचा—बिस्तर के पास एक छोटा सा कागज़ का टुकड़ा पड़ा था, जिस पर सिर्फ़ एक शब्द लिखा था: “विश्वासघात।”
विक्रम ने सोचा, “यह शब्द ज़रूर किसी के खिलाफ़ गवाही दे रहा है।” लेकिन सवाल था—किसका?
श्रीकांत वर्मा के संबंध
श्रीकांत वर्मा का निजी जीवन काफी उलझा हुआ था। उनका कोई परिवार नहीं था, लेकिन उनके व्यवसाय में कई लोग शामिल थे। सबसे पहले पुलिस ने हवेली के नौकरों से पूछताछ की। नौकरानी ने बताया कि श्रीकांत वर्मा का अपनी कंपनी के एक साझेदार, रवि मेहता, के साथ पिछले कुछ समय से विवाद चल रहा था। रवि, श्रीकांत की सफलता से जलता था और कई बार दोनों के बीच झगड़ा भी हुआ था।
विक्रम ने तुरंत रवि से पूछताछ करने का फैसला किया। रवि ने कहा, “हाँ, हमारे बीच विवाद था, लेकिन मैं उन्हें मारने की सोच भी नहीं सकता। हत्या के समय मैं अपनी पत्नी के साथ घर पर था।”
रवि के अलिबाई को जाँचने पर यह सही साबित हुआ, जिससे वह निर्दोष साबित हो गया। विक्रम ने महसूस किया कि हत्या की गुत्थी और भी जटिल हो गई थी।

नए सुराग़
जाँच के दौरान, विक्रम को पता चला कि श्रीकांत वर्मा के पास कुछ कीमती दस्तावेज़ थे, जो उनके व्यापार के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे। उन्होंने हाल ही में एक बड़ी डील साइन की थी, जिसके बारे में सिर्फ़ उनके सबसे करीबी लोगों को जानकारी थी। विक्रम को यह भी पता चला कि श्रीकांत का अपने भतीजे, नितिन, से काफी विवाद हुआ था। नितिन एक अय्याश और जुआरी था, और उसने श्रीकांत से कई बार पैसे माँगे थे, लेकिन हर बार इंकार कर दिया गया।
विक्रम ने नितिन से बात की। नितिन ने बताया, “हाँ, मैं चाचा से पैसे माँगता था, लेकिन मैंने उन्हें कभी नुकसान पहुँचाने की कोशिश नहीं की। हत्या के वक्त मैं शहर से बाहर था।”
हालांकि नितिन के पास भी एक ठोस अलिबाई थी, फिर भी विक्रम को उस पर शक हो रहा था।
चौंकाने वाला खुलासा
जाँच में और गहराई में जाने के बाद, विक्रम को एक अहम सुराग मिला। हवेली के पास ही एक ज्वेलरी की दुकान थी, जहाँ हत्या की रात नितिन को देखा गया था। उसने वहाँ से एक भारी मूर्ति खरीदी थी, जो हत्या के हथियार से मेल खाती थी। विक्रम ने जब नितिन को फिर से सवालों में घेरा, तो उसका चेहरा सफेद पड़ गया। वह घबरा गया और टूट गया।
नितिन ने आखिरकार सबकुछ कबूल कर लिया। उसने कहा, “चाचा ने हमेशा मुझे पैसे के लिए तड़पाया। जब उन्होंने मेरे जुए के कर्ज चुकाने से मना कर दिया, तो मैं गुस्से में आ गया। मैंने प्लान बनाया और उस रात हवेली में गया। मैंने उनसे पैसे माँगे, लेकिन जब उन्होंने फिर मना किया, तो मैंने गुस्से में आकर वह मूर्ति उठाई और उन पर वार कर दिया। मुझे लगा कि कोई नहीं जान पाएगा, क्योंकि मैंने दरवाजा अंदर से बंद कर दिया था और खिड़की से बाहर कूदकर भाग गया।”
हत्या की गुत्थी सुलझी
विक्रम ने यह गुत्थी सुलझाकर पुलिस को सबूत सौंप दिए। नितिन को गिरफ्तार कर लिया गया और उसे अपने अपराध की सज़ा मिली। श्रीकांत वर्मा की हत्या का सच सामने आ चुका था—यह विश्वासघात और लालच की कहानी थी।
विक्रम ने एक और जटिल केस सुलझाया, और शहर में एक बार फिर शांति लौट आई।
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